New Love – a Poem Posted on March 15, 2021July 23, 2024 by Reet Singh Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Share on LinkedIn (Opens in new window) LinkedIn Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky More Share on Threads (Opens in new window) Threads Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading…
I reprised/rewrote lines from nineties — ” शीतल, श्यामल सुरभित शाम बरखा की बूंदों में भीगी शर्माई सकुचाई शाम पायल की छनछन को रोके होंठ काटती हंसी को रोके दबे पाँव चलते चलते आंखों पर करतल रख पूछे है – ‘मैं हूँ कौन’ सखी तुम प्रारब्ध मेरा कुछ कर्म अच्छे किये होंगे जो तुम आई कुछ कर्म तुम्हारे बिगड़े होंगे जो तुम्हें हम मिले बहरहाल सावन है बारिश है शाम है यौवन है हम हैं तुम हो कल किसने देखा है” Loading... Reply
Lovely!!
Beautiful.
I reprised/rewrote lines from nineties —
”
शीतल, श्यामल सुरभित शाम
बरखा की बूंदों में भीगी
शर्माई सकुचाई शाम
पायल की छनछन को रोके
होंठ काटती हंसी को रोके
दबे पाँव चलते चलते
आंखों पर करतल रख
पूछे है – ‘मैं हूँ कौन’
सखी
तुम प्रारब्ध मेरा
कुछ कर्म अच्छे किये होंगे
जो तुम आई
कुछ कर्म तुम्हारे बिगड़े होंगे
जो तुम्हें हम मिले
बहरहाल
सावन है
बारिश है
शाम है
यौवन है
हम हैं
तुम हो
कल किसने देखा है”
Lovely! Thanks…